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Tuesday, 11 June 2013

किसी को अपना बनाना तो है आसान नहीं

किसी को अपना बनाना तो है आसान नहीं
कलेजा चीर दिखाना तो है आसान नहीं
दो जुदा राहें, खयालात भी जुदा हों जब यूं
कदम कदम से मिलाना तो है आसान नहीं
अजनबी गुल, वो गैरों की चमन की रौनक  
उसको साँसों में बसाना तो है आसान नहीं
शबाब हुश्न पे आया है सामने तो क्या
गुलों से नजरें मिलाना तो है आसान नहीं
जिसे नजरों नें कभी मान लिया अपना खुदा
उसे फिर दिल से भुलाना तो है आसान नहीं
शोख आँखों को जो देखा तो थरथराये लव
शर-ए-नजरों से बचाना तो है आसान नहीं
करके रोशन चिराग घर में न इतरा आशु
हवादिस में यूं जलाना तो है आसान नहीं

डॉ आशुतोष मिश्र , निदेशक ,आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश मो० ९८३९१६७८०१

Thursday, 30 May 2013

आँखें भी दिख रही हमें दो की जगह चार

चाँद अजनबी क्या दिल को भा गया है यार 
धड़कन-ए-दिल कहने लगी हो रहा हो प्यार
    आँखों में अपनी थे सजे जो सपने हजारों
     सपने सभी वो होने लगे चाँद पे निसार  
कुछ ऐसा हो गया हूँ मैं जैसा कभी न था
ना मर्ज है कोई मगर मैं लगता हूँ बीमार
   जादू कोइ ना कोई तो हम पर हुआ जरूर
    मंजर वही भाने लगे जो लगते थे बेकार
दर्पण के सामने खड़े हम झूठ क्यों बोलें
आँखें भी दिख रही हमें दो की जगह चार
   सोचा था जब मिलेंगे उनसे क्या क्या कहेंगे
   उनसे जो मिले लव न खुले सब हुआ बेकार
 हुस्न गुल का देख ज्यों आशु के बढे हाँथ
 छुपे पहरेदार खारों ने कर डाला तार-तार

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा उत्तर प्रदेश
९८३९१६७८०१

Friday, 24 May 2013

सभी गद्दारों को अब देश निकाला दे दो


या तो हर शख्स को कंठी माला दे दो
या हर बच्चे के हाथों में भाला दे दो
उनको हर शाम ढले हाथों में हाला देकर
हमको गर हो सके बिष का प्याला दे दो
बेंच देंगे ये वतन करके घोटाले यूं ही
हमें चुप रखने बस मुंह में निबाला दे दो
ग्रहण की तरह खा लेंगे ये आफ़ताबे वतन
इन्हें सागर में डुबो हमको उजाला दे दो
इनके वादों ने ही गुमराह किया है अबतक
इनके होंठो पे एक मोटा सा ताला दे दो
मीन सी जनता फस गयी है इनके जालों में
इनको हम भी फसा सकें कोई जाला दे दो
माँ की कीमत नहीं समझेंगे कभी ये जालिम
इनसे कह दो वहीं जाएँ, इन्हें खाला दे दो
हिंदियों को गर है महफूज वतन में रखना
सभी गद्दारों को अब  देश निकाला दे दो
ये मगरमच्छ हैं ,अश्कों पे न जाना आशु
इनसे कह दो की सारा माल वो काला दे दो


डॉ आशुतोष मिश्र , निदेशक ,आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश मो० ९८३९१६७८०१

Friday, 17 May 2013

सोचते हैं प्यार कर लें जिन्दगी में एक दफा


सोचते हैं प्यार कर लें जिन्दगी में एक दफा 
ये खता हम यार कर लें जिन्दगी में एक दफा 

   तनहा-तनहा ये सफ़र-ए-जिन्दगी कटता नहीं 
   सोचा आँखें चार कर लें जिन्दगी में एक दफा 

मुद्दतों से है माह छुप बैठा है घूंघट में कहीं 
माह के दीदार कर लें जिन्दगी में एक दफा 
   
जिन करों में थी कभी शमशीर के मानिंद कलम
   सोचा बना लें हार उनको जिन्दगी में इक दफा 

जोखिमों से भरा है माना ये दरिया इश्क का 
सोचते पर पार कर लें जिन्दगी में एक दफा 

   जिन अदाओं को ज़माना कहता है आशु फरेब 
   सोचा हम ऐतवार कर लें जिन्दगी में एक दफा 



डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
 बभनान गोंडा  उत्तरप्रदेश 

Wednesday, 8 May 2013

मैं नहीं बोल पाऊंगा




 मैं नहीं बोल पाऊंगा
एक दिन मेरे बायोलोजी के शिक्षक ने
भरी कक्षा में एक प्रश्न उठाया
बच्चों बिल्ली के गुणों को समझाओ 
इसके गुणों की किसी अन्य जीव से
उदाहरण सहित समानता बताओ
छात्रों ने कई गुण बताये
समानता में शेर और चीते के नाम भी सुझाए
अवसर पाकर मैंने भी मुह खोला
बिल्ली के गुण बताये
लेकिन जैसे ही बिल्ली को नेता के समरूप बतलाया
मेरा शिक्षक चिल्लाया
मूर्ख! नेता को बिल्ली बता रहा है
मैंने कहा नाराजगी मत दिखाइए
उदाहरण  पर गौर फरमाइए
चोरों के तरह दूध पीती बिल्ली पर
जब नजर पड़ जाती है
 बिल्ली छुप जाती है
जब चारों तरफ से घिर जाती है
आक्रामक हो जाती है
बिल्ली की जूठन किसी के काम नहीं आती है
बिल्ली माल खाए तो खाए नहीं तो धुलकाये
ऐसे  ही नेता जब घोटाले  करता पकड़ा जाता है
छुप जाता है
जब सीबीआई की जांच में घिर जाता है
आक्रामक हो जाता है
माल जब नहीं पचा पाता है तो स्विस बैंक पहुँचाता है
ये मामला 
यान को अन्तरिक्ष पहुचाते राकेट सा नजर आता है
यान अंतरिक्ष में और माल स्विस बैंक में जाता है
रॉकेट की तरह नेता भी बापस लौट आता है
यान तो यदा कदा बापस भी आ जाता है
माल कभी नहीं आता है
बिल्ली की तरह नेता
माल पचा पाए तो पचाता 
नहीं तो लुढकाता है  
और इसका भी जूठा
किसी के काम नहीं आता है
मैंने कहा यदि सहमत हों तो
सहमती में सर हिलाइए
मेरी पीठ थपथपाइए
गुरूजी बोले निजात कैसे मिलेगी
ये भी तो बताईये
मैंने कहा निजात तब मिल पायेगी
जब......
जब...कब....?
पहेली मत बुझाओ
जबाब बताओ
मैं बोला मैं नहीं बोल पाऊंगा
मुह का ताला नहीं खोल पाऊँगा
क्योंकि बीरता के प्रतीक स्वरुप किसी को
शेर बता दो तो सीना फुलाता है
बफादारी के प्रतीक स्वरुप
कुत्ता कह दो तो गुर्राता है
मगर हकीकत में कुत्ते सी बफादारी  का जज्वा ही
बिल्ली सी शैतानियत को कब्जे में लाएगा
इन बिल्ली नेताओं से देश
तब तक नहीं बच पायेगा
जब तक पूरा हिन्दुस्तान 
 ----- नहीं हो जाएगा

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० ९८३९१६७८९०१







Monday, 29 April 2013

मैकदे मैं उम्र गुजरी है तमाम

मैकदे में   उम्र गुजरी है तमाम 
    हाथों में शामो-सहर, रिन्दों के जाम 
सामने साकी खड़ी सागर लिए 
    आज अपनी मयकशी का इम्तिहान 
आज होकर बज्म में खामोश हम 
    पढ़ रहे थे आँखों से बहते कलाम 
इश्क गहराता गया संग वक़्त के 
   मय पुरानी हुई  दिलकश हुआ जाम 
इस तरह गर तुम गले हमसे मिले 
   तय उछलना ही शहर में मेरा नाम 
है मुहब्ब्बत पाक तेरी माना मैंने 
   "आशु " बख्शेगा नहीं पर ये जहान






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डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव    ऑफ़ फार्मेसी बभनान, गोंडा 
    

Wednesday, 10 April 2013

मेरा साया

मेरा साया


मेरा साया चलता रहा
क़दमों से कदम मिला दिन भर
और रात होते ही
गायब हो गया दबे पांब
बेबफा प्रेमिका की तरह
जूझता रहा मैं अकेला

गहन सन्नाटों में
ढूंढता रहा रोशनी की एक किरण
किन्तु सहसा ही
गहन तम को चीरती
सैकड़ों प्रकाशित किरणों से
चमक उठे मेरे चक्षु
और जब दौड़ने लगता हूँ मैं
सहसा ही लगता है
दौड़ रहा है कोई और भी
मेरे साथ, जाना पहचाना
रुकता हूँ उसके लिए
फिर सहसा ही
मेरे होंठों को चीर कर
निकलता है तीब्र स्वर
मेरे साए, धोखेबाज
कहाँ गया था तू?
गिड़गिड़ात़ा है साया
शपथ लेता है, कहीं ना जाने की
फिर चलता है कदम से कदम मिला
अचानक एक गर्जना के साथ
स्याह हो जाता है आकाश
और सिमटते रश्मि पुंज के साथ
खिसकने लगता है साया दबे पाँव
फिर बंद होती हैं पलकें
सामने होते हैं कृष्ण
और जोड़कर दोनों हाथ
मांग लेता हूँ मैं
रोशनी की जगह अनंत अन्धकार
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल 9839167801





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